خطِّ ميخيیِ فارسيیِ باستان خطّی است که به چند صورتِ کتيبه و لوحِ گِلي و مُهردر ايران و ترکيه و مصر يافت شده است؛ اين خطّ در حدودِ نيمههایِ سدهیِ ششمِ پيشازميلاد به دستورِ داريوشِ بزرگ برایِ ثبتِ پیامهایِ او بر کتيبههایِ کاخها، مانندِتختجمشيد، و بر سینهیِ کوهها، مانندِ کتيبهیِ بيستون، ابداع شد.
اگرچه ظاهرِ برخی از نويسههایِ اين خطّ همانندِ نويسههایِ ميخيیِ پيشين در سومِرو اَکَد به نظر میرسد، بايد دانست که فقط يک نويسه –یعنی LA - از آن خطّها گرفته شده است؛ زيرا صدایِ مربوط به اين نشانه در زبانِ فارسيیِ باستان وجود ندارد از همين رو اين نشانه را برایِ نوشتنِ نامهایِ بيگانه به کار میبرده اند.
طبيعتِ خطِّ ميخي به گونهيی است که برایِ نوشتنِ نامه و سند مناسب نيست؛ ازهمينرو شاهانِ هخامنشي در مکاتباتِ اداري از خطِ آرامي، و گاهی همعيلامي استفاده میکردند.
بیاستفاده ماندنِ خطِّ ميخيیِ ايراني باعث شد که ويژهگيیِ برجستهیِ آن __يعنی مصوِتنويس بودنِ نسبيیاش__ فراموش شود و به دورههایِ بعديیِ تکاملِ زبانِ فارسي نرسد و بر خطّهایِ بعدي هم اثر نگذارد.
جدولی که در پِی میآید نويسههایِ فارسيیِ باستان را در سه ستون نشان میدهد. در ستونِ سمتِ چپ ۲۱ هجا آمده است. اگر این هجاها را حرفنويسي بکنیم خواهیم دید که همه به <-a> پايان میيابند، یعنی همهیِ هجاهایِ اين ستون از يک صامِت و يک مصوِتِ <a> تشکيل شده اند.
ستونِ مياني جایِ نمايشِ چهار هجایِ پايانيافته به <-i> است؛ و سرانجام در ستونِ سمتِ راست هفت هجایِ پايانيافته به <-u> نشان داده شده است.
چنان که میبينيم، در دو ستونِ مياني و راست جایِ برخی از نويسهها خالي است. برایِ پرکردنِ اين جاهایِ خالي بايد همهیِ مصوِتهایِ <a> را که در ستونِ سمتِ چپ آمده است ناديده گرفت، تا فقط صامِتها باقی بمانند؛ بعد هرکدام از اين صامِتها را که جایشان در ستونِ مياني خالي است با (i) ترکيب کرد تا هجاهایِ (i)دار به دست آيد؛ البته بهاستثنایِ چهار نويسهیِ کاملِ di] b] و ji] j] و
[mi] و v [vi] که هرکدام يک هجانگارِ مستقل است.
بعد بايد در ستونِ سمتِ راست همين کار را __بهجز در موردِ هفت نويسهیِ کاملِ <du> و <gu> و <ku> و <mu> و <nu> و <ru> و <tu>__ با مصوِت (u) هم انجام داد تا هر سه ستون کامل شوند.
به طورِ خلاصه میتوان گفت که در ستونِ سمتِ راست علاوه بر هجاهایِ <a>دار همهیِ صامِتها نيز حضور دارند و آماده اند تا با دو مصوِتِ ديگر هجاهایِ ديگرِ <i>دار و <u>دار را بسازند. از همينرو در اين ستون a به صورتِ بالانشين نشان داده شده است (<da>).
به سخنِ ديگر، ba] B] را میتوان یک هجایِ کامل دانست و به صورتِ <ba> حرفنويسيیاش کرد یا صامِت شمردش و به صورتِ <b> حرفنويسيیاش کرد و مانندِ صامِت در ميان يا پايانِ واژه به کارش گرفت.
پس میتوان نتيجه گرفت که خط فارسيیِ باستان بهطورِ نِسبي هجانگار است[۱]؛ زيرا فقط برخی از هجاهایِ آن مانندِ خطّهایِ الفبايي از ترکيبِ صامِت و مصوِت ساخته میشوند.
گليف
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حرف
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کيبُرد
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گليف
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حرف
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کيبُرد
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گليف
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حرف
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کيبُرد
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A
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<a,ā>
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A/a
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i
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<i>
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i
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u
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<u>
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u
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B
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<ba>
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B
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x
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<ča>
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x
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D
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<da>
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D
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b
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<di>
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b
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d
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<du>
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d
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F
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<fa>
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F/f
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G
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<ga>
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G
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H
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<ha>
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H
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J
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<ja>
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J
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j
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<ji>
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j
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K
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<ka>
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K
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k
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<ku>
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k
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L
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<la>
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L/l
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M
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<ma>
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M
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<mi>
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؟
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m
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<mu>
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N
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n
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<nu>
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n
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P
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<pa>
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P/p
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R
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<ra>
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R
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r
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<ru>
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r
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s
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<sa>
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s
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E
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<ça>
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E/e
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T
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<ta>
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T
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t
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<tu>
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t
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X
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<ša>
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X
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S
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<θa>
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S
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V
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<va>
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V
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W
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<vi>
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v
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h
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<xa>
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h
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y
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<ya>
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Y/y
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Z
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<za>
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Z/z
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در خطِّ ميخيیِ فارسيیِ باستان برایِ برخی نامهایِ پُرکاربُرد از اين واژهنگارها استفاده میشده:

عددها
گويا از عددهایِ خطِّ ميخي فقط اين نويسهها به ما رسيده است:
1=۱, 2=۲, 3=۳, 4=۴ … !=۱۰, @=۲۰, #=۳۰, $=۴۰
اما در برخی منابع اين فهرست کاملتر نشان داده شده است:
۴۰
|
@@
|
۲۰
|
@
|
۱۰
|
!
|
۱
|
1
|
۶۰
|
@@@
|
۲۲
|
@2
|
۱۲
|
!2
|
۲
|
2
|
۱۲۰
|
0@
|
۲۳
|
@3
|
۱۳
|
!3
|
۳
|
3
|
|
|
۲۵
|
@5
|
۱۴
|
!4
|
۵
|
5
|
|
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۲۶
|
@6
|
۱۵
|
!5
|
۷
|
2221
|
|
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۲۸
|
@7
|
۱۸
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!8
|
۸
|
8
|
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۱۹
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!9
|
۹
|
9
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کتيبهیِ داريوش در تختِ جمشيد
بازنويسي و حرفنويسيیِ اين کتيبه، سطربهسطر، چنين است:
D
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A
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R
|
Y
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V
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U
|
X
|
\
|
h
|
X
|
A
|
y
|
S
|
i
|
y
|
\
|
da
|
a
|
ra
|
ya
|
va
|
u
|
ša
|
\
|
xa
|
ša
|
a
|
ya
|
tha
|
i
|
ya
|
\
|
\da-a--ra-ya--va--u--ša \ xa--ša--a-ya-tha-i-ya
V
|
z
|
R
|
K
|
\
|
h
|
X
|
A
|
y
|
S
|
i
|
y
|
\
|
h
|
X
|
A
|
va
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za
|
ra
|
ka
|
\
|
xa
|
ša
|
a
|
ya
|
tha
|
i
|
ya
|
\
|
xa
|
ša
|
a
|
va-za-ra-ka \ xa--ša-a--ya-tha-i-ya \ xa--ša-a
y
|
S
|
i
|
y
|
A
|
N
|
A
|
M
|
\
|
h
|
X
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A
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y
|
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ya
|
tha
|
i
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ya
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a
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na
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a
|
ma
|
\
|
xa
|
ša
|
a
|
ya
|
tha
|
i
|
ya
|
\
|
\ ya-tha-i-ya-a-na-a-ma \ xa-ša-a-ya-tha-i-ya
D
|
H
|
y
|
u
|
N
|
a
|
M
|
\
|
v
|
e
|
X
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T
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a
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s
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p
|
H
|
y
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da
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ha
|
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u
|
na
|
a
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ma
|
\
|
vi
|
i
|
ša
|
ta
|
a
|
sa
|
pa
|
ha
|
ya
|
da-ha-ya-u- na-a-ma \ vi-i-ša-ta-a-sa-pa-ha-ya
a
|
\
|
p
|
u
|
x
|
\
|
H
|
h
|
a
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M
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|
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ha
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xa
|
a
|
ma
|
na
|
i
|
ša
|
i
|
ya
|
\
|
ha
|
a \ pa-u-ça \ ha-xa-a-ma-na-i-ša-i-ya \ ha
y
|
\
|
i
|
M
|
M
|
\
|
T
|
x
|
R
|
M
|
\
|
a
|
c
|
u
|
N
|
u
|
X
|
ya
|
\
|
i
|
ma
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ma
|
\
|
ta
|
ça
|
ra
|
ma
|
\
|
a
|
ku
|
u
|
na
|
u
|
ša
|
ya \ i-ma-ma \ ta-ça-ra-ma \ a-ku-u-na-u-ša
ترجمهیِ سطربهسطرِ کتيبه:
داريوش، شاهِ - بزرگ، شاهِ شا - هان، شاهِ - کشورها، هيستاسب - پور، يک هخامنش - که ساخت اين کاخ را
ترجمهیِ پِيوسته:
داريوش، شاهِ بزرگ، شاهِ شاهان، شاهِ کشورها، هيستاسبپور، يک هخامنش که ساخت اين کاخ را
[۱] مانندِ خطِّ devanagari (دِواناگري) که زبانِ سَنسکريت را با آن مینويسند.